राधा-कृष्ण का विवाह हुआ था या नहीं? इस बात पर आज भी अलग-अलग तर्क और मान्यताएं हैं.
राधा और कृष्ण का प्रेम सबसे चर्चित और पूजनीय कथाओं में से एक है, लेकिन एक सवाल आज भी लोगों के मन में बना रहता है – क्या राधा रानी और श्रीकृष्ण का विवाह वास्तव में हुआ था? यदि हां तो कब और कैसे हुआ और यदि नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ? ये वो सवाल हैं जिनके जवाब अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में अलग तरह से मिलते हैं.
ब्रज में राधा-कृष्ण के विवाह से जुड़ी भांडीर वन की मान्यता भी प्रचलित है. राधा अष्टमी के मौके पर बरसाना के श्री लीड़ली जी मंदिर के सेवायत गोस्वामी ने इस संबंध में एक खास कथा बताई है, जिसमें राधा-कृष्ण के खेल-खेल में विवाह रचाने की बात सामने आती है.
क्या सच में हुआ था राधा-कृष्ण विवाह?
ब्रह्मवैवर्त पुराण में राधा-कृष्ण के विवाह का जो वर्णन मिलता है, उसमें बताया गया है कि वृंदावन के भांडीरवन में स्वयं सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने पुरोहित बनकर श्रीकृष्ण और राधारानी का विवाह करवाया था. ब्रह्मा जी ने ही राधा-कृष्ण के विवाह में सारे वेद मंत्र पढ़े थे और उनका गंधर्व विवाह कराया था.
खेल-खेल में हुआ था विवाह
बरसाने के प्रमुख आध्यात्मिक धाम श्री लाड़ली जी मंदिर में राधारानी की सेवा करने वाले सेवायत भगवानदास जी गोस्वामी बताते हैं कि राधा-कृष्ण का विवाह हुआ था और स्वयं ब्रह्मा जी ने कराया था. यह भी भगवान कृष्ण की एक लीला थी.
एक बार भगवान कृष्ण, राधारानी अपने सखाओं और सखियों के साथ खेल रहे थे. यह उनके बाल रूप का समय था. कृष्ण जी तब मुश्किल से 5 वर्ष (हालांकि कुछ परंपराओं में यह उम्र और कम भी बताई गई है) के थे. जैसे बालक-बालिकाएं गुड्डा-गुडिया का खेल रचाते हैं, वैसे ही सखा और सखियों ने खेल-खेल में राधा और कृष्ण का विवाह रचाने का सोचा.
बस, फिर क्या था वेदी सज गई और स्वयं ब्रह्मा जी पुरोहित बने और भांडीर वन में दोनों का विवाह हुआ. यानी कि यह विवाह हुआ था लेकिन खेल-खेल में हुआ था, न कि किसी राजसी समारोह और पूर्व से तय विवाह की तरह हुआ था. यह भी कृष्ण जी का दुनिया को संदेश देने का अपना ही तरीका था. क्योंकि उनके लिए राधा से प्रेम लौकिक बंधनों से परे थी.
फिर अन्य पुराणों में उल्लेख क्यों नहीं?
श्रीमद्भागवत पुराण, विष्णु पुराण समेत कई ग्रंथों में राधा-कृष्ण के विवाह का सीधा कोई उल्लेख नहीं मिलता है. श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कंध के 30वें अध्याय के 28 वें श्लोक में ‘अनयाराधितो’ शब्द आया है, जिसे वैष्णव परंपराओं में राधा जी से जोड़ा गया है. हालांकि, राधा-कृष्ण के अटूट प्रेम और भक्ति पर कई ग्रंथों में अध्याय लिखे गए हैं. इसके पीछे भी खास वजह है.
राधा-कृष्ण का विवाह न होने के पीछे गहरे आध्यात्मिक कारण भी बताए गए हैं, जैसे राधा-कृष्ण एक ही दिव्य प्रेम के दो स्वरूप थे. राधा जी, श्रीकृष्ण की आराध्या हैं और वे उनके हृदय का आनंद हैं. श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि उन्हें और राधा को वैसे ही अलग नहीं किया जा सकता है, जैसे सूर्य और उसके प्रकाश को अलग नहीं किया जा सकता.
लौकिक बंधनों से परे था राधा-कृष्ण का प्रेम
कई संतों ने कहा है कि राधा-कृष्ण का प्रेम लौकिक बंधनों और सामाजिक रीति-रिवाजों से परे थे. उनका संबंध या प्रेम पति-पत्नी का नहीं था, बल्कि वह शाश्वत और निश्छल प्रेम था.
बाद में कृष्ण ने वृंदावन छोड़ा और फिर मथुरा आए, इसके बाद वे कभी लौटे ही नहीं. पूरी जिंदगी राधा-कृष्ण ने एक-दूसरे के विरह में काटी लेकिन वे एक-दूसरे के हृदय में विराजमान रहे. बाद में भगवान श्रीकृष्ण के कई विवाह हुए. वैसे ही राधा जी के विवाह का भी कुछ ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि उनका विवाह चंद्रसेन नाम के एक गोप से हुआ था. लेकिन इसे लेकर भी अलग-अलग मत है कि वह राधा की छाया मात्र थीं या राधा का माया रूप थीं क्योंकि वास्तविक राधा तो हमेशा श्रीकृष्ण के हृदय में निवास करती हैं.
राधा की जन्म कथा भी है अद्भुत
राधा रानी के जन्म की कथा भी बेहद रोचक है. ब्रह्मवैवर्त पुराण और गर्ग संहिता में जो उल्लेख है उसके मुताबिक राधा रानी का प्राकट्य एक स्वर्ण कमल से हुआ था, ना ही उनका प्राकट्य साधारण जन्म की तरह हुआ था. राजा वृषभानु और उनकी पत्नी कीर्ति ने पूर्व जन्म में कठोर तप करके वरदान पाया था कि स्वयं लक्ष्मी जी उनकी पुत्री के रूप में जन्म लेंगी.
रानी कीर्ति गर्भवती हुईं लेकिन माया ने उनके गर्भ में वायु भर दी, जब प्रसव का समय आया तब राजा वृषभानु रावल में यमुना नदी में स्नान कर रहे थे, वहां उन्हें दिव्य स्वर्ण कमल पर दिव्य शिशु के रूप में राधा रानी प्राप्त हुईं.
बरसाने के सेवायत गोस्वामी कहते हैं कि ब्रज की प्रचलित मान्यताओं के अनुसार राधा रानी का प्राकट्य स्वर्ण कमल से ही हुआ था.


