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क्या है हरतालिका तीज की संपूर्ण व्रत कथा, मां पार्वती और शिव जी की पूजा का शुभ मुहूर्त नोट कर लें

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 आज हरतालिका तीज व्रत रखा जा रहा है. इस दिन सुहागिनें मां पार्वती और शिव जी की पूजा कर उनके निमित्त व्रत का संकल्प करेंगी. पूजा के समय हलतालिका तीज की कथा का भी पाठ करेंगी. आइए इस बारे में विस्तार से जानें.

हरतालिका तीज व्रत 2026 शुभ मुहूर्त

भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 13 सितंबर को सुबह 7 बजकर 8 मिनट पर शुरू होकर 14 सितंबर को सुबह 7 बजकर 6 मिनट पर समाप्त होगी. हरितालिका तीज पर पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 26 मिनट से लेकर सुबह 7 बजकर 6 मिनट तक होगा.

हरतालिका तीज की व्रत कथा

पौराणिक कथा है कि ओं के अनुसार, एक बार की बात है कैलाश पर्वत के सुंदर शिखर पर विराजमान शिव जी से माता पार्वती जी ने प्रश्न किया हे महेश्वर!आपको मैंने किस भांति पाया, कौन सा व्रत, तप और दान किए कि मुझे वर रूप में आप मिले? कृपया विस्तारपूर्वक बताएं. भगवान शंकर बोले- हे देवी, आर्यावर्त में हिमालय नाम का एक महान पर्वत है. हे पार्वती जी ! तुमने बाल्यकाल में वहीं परम तप किया. वैशाख मास में अग्नि में प्रवेश कर तप किया. श्रावण में बाहर खुले में निवास करते हुए अन्न का त्याग कर तप किया. तुम्हारे उस कष्ट से तुम्हारे पिता चिंतित हुए और सोचने लगे कि मैं इस कन्या का विवाह किससे करूं? तभी ब्रह्मा जी के पुत्र नारद जी वहां आए. देवर्षि नारद ने तुम्हें देखा. हिमालय ने देवर्षि से कहा-हे मुनीश्वर! आप यहां आए , कहिये क्या आज्ञा है? इस पर नारद जी ने कहा- हे गिरिराज! मैं विष्णु भगवान के भेजने पर यहां आया हूं. आप अपनी कन्या को उत्तम वर को दान करें. विष्णु भगवान के समान कोई उत्तम नहीं. ऐसे में मेरे मतानुसार अपनी कन्या का दान विष्णु जी को करें. इस पर हिमालय ने देवर्षि नारद के मत को स्वीकृति दे दी और नारद जी बैकुंठ भगवान विष्णु के पास लौट गए. नारद जी ने भगवान विष्णु से कहा- हे प्रभु! आपका विवाह तय हो चुका है. वहीं दूसरी ओर हिमालय ने प्रसन्नता पूर्वक पार्वती जी से कहा- हे पुत्री मैंने भगवान विष्णु को तुम्हें अर्पण कर दिया है. पिता की इस बात पर अपनी सहेली के घर जातक पार्वती जी दुखी होकर विलाप करने लगीं. जिस पर सखी ने पूछा हे देवी! तुम किस कारण दुखी हो. पार्वती जी ने कहा सखी! मैं महादेव जी से विवाह करना चाहती हूं लेकिन पिता जी ने भगवान विष्णु के साथ मेरा विवाह तय किया है. ऐसे में निःसन्देह इस शरीर का त्याग कर दूंगी. यह सुन सखी ने सुझाया कि हे देवी! तुम्हारे पिताजी ने जिस वन को न देखा हो वहां जातक चली जाओ. पार्वती जी ने ऐसा ही किया. आगे बताते हुए महादेव ने कहा पिता हिमालय ने जब तुम्हें घर में नहीं पाया तो उन्हें ऐसा लगा जैसे किसी ने उनकी पुत्री का हरण कर लिया है. मैंने वचन दिया था कि मैं पुत्री का विवाह विष्णु जी से करूंगा. हाय, अब इस वचन को कैसे पूरा करूं. वे चिंता में मूर्छित हो गए. मूर्छा टूटने पर गिरिराज घने जंगल में तुम्हें ढूंढने निकले. दूसरी ओर तुम अपनी सखी के साथ वन में एक नदी के तट पर एक गुफा में जा पहुंची. इसी गुफा में प्रवेश कर तुमने अन्न जल का त्याग किया और बालू का शिवलिंग बनाया और मेरी उपासना करती रहीं. उस समय भाद्रपद मास की हस्त नक्षत्र युक्त तृतीया तिथि थी तब तुमने विधि विधान से मेरी पूजा की और रात्रि को गीत गायन कर जागरण किया. तुन्हाने उस महाव्रत से मेरा आसन डोल गया और मैं वहीं जा पहुंचा जहां पर तुम तप कर रही थी. मैंने तुमसे कहा हे वरानने, तुमसे प्रसन्न हूं मैं, वरदान मांगो. इस पर तुमने कहाहे देव, यदि आप मुझसे प्रसन्न हुए हैं तो मुझे वर दें कि आप महादेव ही मुझे मेरे पति रूप में मिलें. इस पर मैंने’तथास्तु’ कहां और कैलाश पर्वत लौट आया. तुमने प्रभात होने पर बालू के शिवलिंग को नदी में विसर्जित किया. हे शुभे, तुमने सखी सहित व्रत का पारायण कर लिया. वहीं तुम्हें ढूंढते हुए तुम्हारे पिता उसी घने वन में आ पहुंचे जहां नदी के तट पर दो कन्याओं को देखा. तुम्हारे पास आकर उन्होंने तुम्हें हृदय से लगाया. तुमने कहा हे पिता, मैंने अपना शरीर पहले ही शिव जी को समर्पित कर दिया था लेकिन आपने इसके विपरीत कार्य किया. इसी कारण मैं वन में आ गए. इस पर हिमालय ने कहा मैं तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध यह कार्य नहीं करूंगा. जिसके बाद तुम घर लौट आई और तुम्हारे पिता ने तुम्हारा विवाह मेरे साथ कर दिया. हे प्रिये, तुम उसी व्रत के प्रभाव से तुम मेरी अर्द्धांगनी बनी हो. हे देवी! इस व्रत का नाम हरतालिका इसलिए पड़ा क्योंकि तुम्हारी सखी तुम्हारा हरण करके ले गई. भगवान शंकर आगे बोले सौभाग्य की इच्छा रखते हुए स्त्रियां इस व्रत को विधि पूर्वक रखें. केले के खंभों से मण्डप बनाएं उसे वंदनवारों से सुशोभित कर दें. उसमें उत्तम रेशमी वस्त्र की चांदनी तान दें. चंदन आदि सुगंदित द्रव्यों का लेपन कर स्त्रियां एकत्र हों और शंख, भेरी आदि बजवाएं. विधि पूर्वक मंगलाचार करें. गौरी शंकर की बालू की प्रतिमा स्थापित कर गन्ध, धूप, पुष्प आदि से विधिपूर्वक पूजन करें.