धर्म नगरी काशी में हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को लोलार्क छठ का पवित्र महापर्व मनाया जाता है. इस पावन अवसर पर भगवान सूर्यदेव की पूजा-अर्चना का खास महत्व माना गया है.
संतान सुख की आस में देश-विदेश से लाखों दंपत्ति वाराणसी स्थित प्राचीन लोलार्क कुंड में आस्था की डुबकी लगाने पहुंचते हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिव्य कुंड में सही नियमों का पालन करते हुए स्नान करने से निसंतान दंपत्तियों को संतान की प्राप्ति होती है.
अगर आप भी इस साल लोलार्क कुंड में स्नान करने आ रहे हैं, तो इससे जुड़े जरूरी वास्तु और धार्मिक नियमों को जान लेना बेहद आवश्यक है.
हाथों में हाथ डालकर लगाएं 7 डुबकी
कुंड में स्नान के दौरान कुछ नियमों का पालन करना अनिवार्य है. स्नान करते समय पति-पत्नी को एक-दूसरे का हाथ मजबूती से थामे रखना चाहिए.
कुंड में उतरने से पहले महिला को अपने आंचल में एक फल और सुहाग का श्रृंगार सामान रखना होता है.
कुंड में प्रवेश करते ही भगवान सूर्य के मंत्रों का ध्यान करते हुए इस फल और सामग्री को जल में अर्पित कर देना चाहिए. इसके बाद सूर्यदेव का ध्यान करते हुए दंपत्ति को एक साथ कुंड में 7 बार डुबकी लगानी चाहिए.
पुराने कपड़े छोड़कर पहनें नए वस्त्र
कुंड में 7 बार डुबकी लगाने के बाद दंपत्ति को अपने सभी पुराने वस्त्र वहीं कुंड के तट पर छोड़ देने चाहिए. इन कपड़ों को वापस घर ले जाना वर्जित माना जाता है.
स्नान के तुरंत बाद दंपत्ति को नए और स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए. इसके बाद लोलार्केश्वर महादेव के दर्शन करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए. लोलार्केश्वर महादेव की पूजा किए बिना ये स्नान पूरा नहीं माना जाता है.
ऐसा करने से संतान की प्राप्ति होती है और सूर्यदेव का आशीर्वाद सदैव परिवार पर बना रहता है.
भूलकर भी न करें यह बड़ी गलती
लोलार्क कुंड स्नान का सबसे कड़ा नियम उस फल से जुड़ा है जिसका दान आपने जल में किया होता है. पूजा के दौरान आप जिस फल को कुंड में अर्पित करते हैं, जब तक आपकी मन्नत पूरी नहीं हो जाती, तब तक दंपत्ति को जीवन में उस फल का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए.
उदाहरण के तौर पर अगर आपने सेब या केला अर्पित किया है, तो मन्नत पूरी होने तक उस फल को खाने से पूरी तरह बचना चाहिए. नियमों की अनदेखी करने पर आपकी प्रार्थना अधूरी रह सकती है.
संतान की दीर्घायु का उपाय
जब सूर्यदेव की कृपा से दंपत्ति को संतान की प्राप्ति हो जाए, तब उन्हें दोबारा काशी आकर लोलार्क कुंड में हाजिरी लगानी होती है. मन्नत पूरी होने के बाद दंपत्ति को अपनी संतान के साथ वापस इसी पावन स्थान पर आना चाहिए.
यहां आकर भगवान सूर्य और लोलार्केश्वर महादेव को हलवा और पूरी का भोग लगाना चाहिए. ऐसा करने से संतान को लंबी उम्र मिलती है और वह जीवन भर सभी प्रकार के रोगों और कष्टों से मुक्त रहती है.
17 सितंबर को लोलार्क छठ
इस वर्ष लोलार्क छठ का महापर्व 17 सितंबर को मनाया जाएगा. 17 सितंबर की रात 2 बजे से ही कुंड में दिव्य स्नान का सिलसिला शुरू हो जाएगा, जो पूरे दिन लगातार जारी रहेगा.
लाखों की अनुमानित भीड़ को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने करीब 2 किलोमीटर लंबी बैरिकेडिंग कराई है.
श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सहूलियत के लिए आला अधिकारियों और पुलिस बल की तैनाती की गई है, ताकि भक्त बिना किसी परेशानी के आसानी से दर्शन और स्नान कर सकें.







