उत्तराखंड के अल्मोड़ा के पास स्थित त्रिनेत्र महादेव मंदिर अपनी 1000 साल पुरानी वास्तुकला, सुयाल नदी के तट और मौसम का सही अनुमान देने वाले रहस्यमयी जलकुंड के लिए प्रसिद्ध है.
पहाड़ों और हरियाली के बीच बसा यह मंदिर किसी को भी शांति का अहसास कराता है.
यहां बहती सुयाल नदी की धारा और छोटे-छोटे झरने इस जगह की खूबसूरती को और बढ़ा देते हैं. आज हम इस खबर में 9वीं-10वीं सदी के इस गुप्त और प्राचीन मंदिर से जुड़े दिलचस्प रहस्य के बारे में जानेंगे.
बिना मसाले के बने हैं 16 प्राचीन मंदिर
इस पूरे परिसर में करीब 16 प्राचीन शिव मंदिर बने हुए हैं. इन मंदिरों का निर्माण 9वीं और 10वीं शताब्दी के बीच कराया गया था. इनकी बनावट प्रसिद्ध जागेश्वर धाम के मंदिरों जैसी ही नजर आती है.
इन मंदिरों को तराशे गए पत्थरों को एक के ऊपर एक रखकर बनाया गया है. खास बात यह है कि इनको जोड़ने के लिए चूने या सीमेंट जैसे किसी मसाले का इस्तेमाल नहीं हुआ है.
मुख्य मंदिर परिसर के पास ही पैदल पार करने वाला एक छोटा पुल है. इसे पार करते ही आपको कई अन्य सुंदर और प्राचीन देवालयों के दर्शन होते हैं.
मूर्तियों और पत्थरों में दिखता है इतिहास
सुरक्षा के लिहाज से मंदिर की कई दुर्लभ प्राचीन मूर्तियों और अवशेषों को एक छोटे से कमरे में रखा गया है. पर्यटक बाहर खिड़की से भी इनके दर्शन कर सकते हैं. कुछ मंदिरों के ऊपरी हिस्से के खास नक्काशीदार पत्थरों को नीचे फर्श पर स्थापित किया गया है.
इन पत्थरों में शिवलिंग बने हैं, जिनकी श्रद्धालु पूजा करते हैं. मंदिरों के गर्भगृह में भगवान विष्णु, सूर्यदेव, लक्ष्मी-नारायण, कार्तिकेय और उमा-महेश की सुंदर प्रतिमाएं स्थापित हैं. यहां कभी जैन तीर्थंकरों की भी मूर्तियां थीं, जिन्हें अब अल्मोड़ा संग्रहालय में सुरक्षित रख दिया गया है.
बारिश आने से पहले बढ़ जाता है जलस्तर
यहां बड़े मंदिरों के पास भगवान शिव और शेषनाग को समर्पित एक छोटा सा मंदिर है. इस छोटे मंदिर के अंदर पानी का एक कुंड बना हुआ है. स्थानीय लोगों का मानना है कि इस कुंड के पानी का सीधा कनेक्शन मौसम के बदलाव से है.
जब भी इलाके में भारी बारिश होने वाली होती है, उससे कुछ दिन पहले ही कुंड का जलस्तर अपने आप बढ़ने लगता है. यह पानी लोगों के लिए बारिश की पूर्व चेतावनी की तरह काम करता है. लोग इस कुदरती इशारे पर गहरा विश्वास रखते हैं.
सूखा पड़ने पर पूजा से आती है बारिश
इस मंदिर परिसर से एक और बेहद अनोखी मान्यता जुड़ी हुई है. जब कभी इस पहाड़ी क्षेत्र में लंबे समय तक सूखा पड़ता है या बारिश नहीं होती, तो गांव वाले इस छोटे मंदिर में इकट्ठा होते हैं.
सभी लोग मिलकर यहां भगवान शिव और शेषनाग का जलाभिषेक करते हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि जल चढ़ाने के दो-तीन दिनों के भीतर ही आसमान में बादल छा जाते हैं और तेज बारिश शुरू हो जाती है. यह परंपरा आज भी यहां पूरे श्रद्धा भाव के साथ निभाई जाती है.
ब्रह्म कुंड के पानी में छिपा है बीमारियों का इलाज
मंदिर के बिल्कुल बगल में सुयाल नदी के बीच एक विशाल चट्टान है. इस चट्टान के पास नदी का पानी एक छोटा सा ताल बनाता है, जिसे ब्रह्म कुंड कहा जाता है. गांव वालों का पक्का विश्वास है कि ब्रह्म कुंड के पानी में औषधीय और दैवीय गुण मौजूद हैं.
इस कुंड में स्नान करने से त्वचा और शरीर की परेशानियां दूर हो जाती हैं. हाल के सालों में इस पूरे मंदिर परिसर की मरम्मत और रखरखाव का काम किया गया है, लेकिन आज भी यहां का पुराना स्थापत्य अपनी मौलिक झलक दिखाता है.